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आत्मा,परमात्मा का मिलन ही सच्चा सौदा, कर्म की है प्रधानता, मानव रुपी मंदिर से कचड़े को करना होगा साफ,तभी जीवन में मिलेगा सुकून और शांति,दास वीरेंद्र सिंह

दिल्ली। प्रेम सर धाम बाजीतपुर में शनिवार को पूज्य संत वीरेंद्र दास जी महाराज ने सतसंग में आयें गुरुमुखी जनों को संबोधित करते हुए कहा कि आत्मा और परमात्मा का मिलन ही सच्चा सौदा है। सच को मानना और जानना ही सतगुरु की राह पर चलना है। बाहर की दुनिया से जुड़ना जीवन में भ्रम पालना है। मानव रुपी मंदिर में ही सारे तीर्थ है। गरीबी और अमीरी पर कहां कि भौतिक संपत्ति जुटा लेंने से कोई अमीर नहीं होता। गरीब भी कोई नहीं है। ईश्वर ने सबकों बादशाह बना के भेजा है। कर्म की प्रधानता है। साकारात्मक सोच से आत्मबल मजबूत होता है। अन्दर की अमीरी ही खास है। बहुत सोचना,कल्पना करना,गरीबी को दावत देना है। विचार शून्य हो जाने से सुकून और शांति मिलती हैं। नाकारात्मक सोच से ही दुःख है। तनाव है। पूज्य महाराज जी ने कहां कि वर्तमान में जीना होगा। जो स्थिति परिस्थिति है अपनाना होगा। जो घटना है वह घटेगा। सबका अपना, अपना कर्म है। सबकी अपनी उम्र है। श्ववास आ रहीं हैं जा रहीं हैं कब रुक जायेगा कुछ कहां नहीं जा सकता। उन्होंने कहां मनुष्य अपने अन्दर व्याप्त कचड़ा ईर्ष्या, निन्दा, चुगली, नफरत,एक दूसरे का बुराई करना, अहंकार, काम, क्रोध,मोह लोभ का परित्याग करके खुद से जुड़कर सिमरन, ध्यान, साधना, बंदगी और परमात्मा का शुक्राना करेगा तभी जीवन में खुशहाली आयेगी। उन्होंने कहां की सभी महापुरुषों का सम्मान करना चाहिए। लेकिन उनके जीवन के आदर्शो को आचरण में उतारना होगा। सतगुरु मानव रुप में संसार में जीवों के कल्याण के लिए आते हैं। खुशहाली देने आते हैं। सच्चा और अच्छा इंसान बनाने आते हैं। जो मानवता और इंसानियत का पुजारी बन सकें। कहां कि मानव जन्म क्यों मिला, इस पर सबको विचार करना होगा। हम कौन हैं। क्यों यहां आयें हैं, हमारे कर्म क्या है,रुहानियत के कालेज में सतगुरु से यह सब जानना होगा। फूल में खुशबू है,दूध में घी है। लकड़ी में आग है। ऐसे ही सतगुरु हर मनुष्य के अन्दर है। खुद से जुड़कर सिमरन के अभ्यास से अनुभव किया जा सकता है। इस अवसर पर सतंसंगीओ की अपार भीड़ रहीं। जेडी सिंह संपादक

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