जौनपुर। आज ही के दिन हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है।भारत देश में पत्रकारिता का महत्व था। सम्मान था।गरिमा थी। लेकिन अब पत्रकारों को चाटुकार,दलाल,बिकाउ कहां जाने लगा है ।प्निन्ट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो पूंजीपतियों के हाथ की कठपुतली बनकर नाच रही है।पत्रकारिता से जुड़े पत्रकार शोषण के शिकार है। कुछ को अच्छा खासा वेतन है तो कुछ को रोटी के लाले है।जिला,तहसील,ब्लाक के पत्रकारों की हालत बहुत अच्छी नहीं कहीं जा सकती है।बड़े अखबार से जुड़े पत्रकारों को जो वेतन मिलता है शायद उनके गुजर बशर के लिए न के बराबर है। आजादी की लड़ाई में मझोले अखबार की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। आज मझोले अखबार अभाव में दम तोड़ रहे है। पहले लोग संस्थाओं के विकास में सहयोग करने में अपना बडप्पन समझते थे।लेकिन अब वह बात नहीं रही। पत्रकारिता करना रिस्की हो गया। सच्चाई लिखने पर राजनैतिक आराजकता का शिकार होना पड़ सकता है। भष्ट्राचार अभी कम नहीं हुआ है।भारत सरकार से जुड़े लोग हो या राज्य सरकारों से जुड़े अधिकारी,कर्मचारी हो ईमानदारी की कमी है।भ्रष्टाचार की बदबू है। किसी भी सरकार के खिलाफ पत्रकारिता नहीं की जा सकती है। बहुतो सांसद,विधायक,मन्त्री की कार्यप्रणाली संतोष जनक नहीं रही है। कुछ ऐसे ईमानदार नेता हैं जिनकी वजह से देश का मान,सम्मान,स्वाभिमान बढ़ रहा है। वर्तमान में मोदी जी की काबिलियत का देश विदेश में शोर है। राष्ट्र प्रगति की ओर है। कुछ ऐसे भी शिरोमणि पत्रकार है जिनकी पत्रकारिता राष्ट्र हित में समर्पित हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी तथाकथित पत्रकार है जो मिशन को बदनाम कर रहे है।
लोकसभा चुनाव में जिस ढंग से अमर्यादित हिन्दी भाषा का उपयोग हुआ है।राजनीति की गन्दी मानसिकता लोगों को समझ में आयी।सत्यवादी बनना होगा।भ्रष्टाचार को खत्म करने का प्रयास करना होगा।
30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य हिंदी के पहले समाचार पत्र ‘उदंड मार्तंड’ के शुरू होने की तारीख को याद रखना था। असल में जब उदंड मार्तंड निकाला जा रहा था, तब देशवासियों के सामने एकमात्र लक्ष्य था- आजादी, अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के लिए खुद की आवाज। पत्रकारिता एक मिशन था- जागरूकता का माध्यम था। चूंकि आज हिंदी पत्रकारिता ना तो मिशन है और ना ही आम आदमी की आवाज- वह तो केवल बाजार की आवाज है और उत्पादों के प्रसार का माध्यम, जाहिर है कि उसे मार्तंड क्यों याद रहेगा।भारत देश में एक तरफ जहां नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद का शपथ लेगें वहीं पत्रकारिता दिवस की भी धूम रहेगी।जो सुख सुविधा नेताओं को है पत्रकारों को क्यों नहीं। आज चौथा स्तम्भ अपने अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहा है।पत्रकारों को भूख नहीं लगती है। क्योंकि उनको पेट नहीं है।उनके पास बाल बच्चे नहीं है।पत्रकारों पर अंगुली उठाने वाले पहले अपने गिरेहबान में झाके तो बात समझ में आने लगेगी। जगदीश सिंह संपादक सतगुरु दर्पण