जौनपुर। चाहे कोई भी समय काल हो हमेशा से ही कमजोर गरीब असहाय सताये जाते रहे है। आज भी सताये जा रहे हैं।
मानव समाज मे यह एक दस्तूर बन गया है। हर इंसान का अपना घर परिवार कुल खानदान होता है। सबका सबसे प्रेम होता है। आपसी भाईचारा होता है। लोग एक दूसरे का सहयोग करके जीवन को सुगमता से हंसी खुशी से जीते हैं। वर्तमान समय मे कोई किसी का नहीं है। सबका अपना मतलब है। मतलब से लोग आपस मे जुड़ते हैं। छोड़ते हैं। पकड़ते हैं। पहले का परिवार खून के रिश्ते को निभाता था। भाई,भाई के लिए जान छिड़कता था। आज भी अच्छे और सांस्कारिक परिवार है। जो संयुक्त परिवार के रुप मे मर्यादित रुप से जीवन यापन करते समाज मे मर्यादा पा रहे हैं। शुक्रवार २९ अगस्त को शाम लगभग ४ बजे के आस पास में सड़क दुघर्टना में गंभीर रूप से घायल जेडी सिंह को देखने सतगुरु धाम बर्राह रामनगर पत्रकारिता से जुड़े पत्रकार व समाजसेवी शमीम अहमद पुत्र निसार अहमद वार्ड मोहल्ला कजियाना मड़ियाहूं निवासी आये और पहले स्वास्थ्य के संबंध में जाने। कैसे घटना हुई। तबियत कैसा है। बातों बात में उन्होंने अपने अन्तर मन की पीड़ा को उजागर किया। दर्द भरी कहानी को सुनकर जिसके भी अन्दर मानवता होगी। उसका दिल जरुर पसीझेगा। करुणा का भाव आयेगा और वह न्याय की बात करेगा। शमीम पत्रकार के मामले की सच्चाई क्या है समूचा नगर जानता है। लेकिन पारिवारिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहता। शमीम ने बताया मेरा हंसता खेलता परिवार था। माता पिता थे। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। कुदरत ने ऐसा खेल खेला जीवन मुसीबत के दौर से गुजर रहा है। कमजोरी की वजह से पैतृक संपत्ति को अपने ही सगे संबंधी हथिया लिये। बहुत विनीत किये, हमारे छोटे-छोटे बच्चे हैं। पत्नी है। कहां हम जायेंगे। कहां रहेंगे। अनत: हमें मजबूर किया गया घर छोड़ने के लिए। नगर के सम्मानित लोगों से भी कहें। देखिए हमारे साथ घर परिवार सगे संबंधी लोग अन्याय कर रहे है। लेकिन कोई सहारा नही बना। उन्होंने कहां २२ साल से घर से बेघर हैं। जहां जन्म हुआ। पले,बढ़े। माता पिता के साथ रहे। शादी विवाह हुआ। आज अपनों के रहते शमीम पत्रकार दर, दर भटक रहा है। रहने के लिए घर नहीं है।किराये के घर में रह रहा हैं। शमीम ने जिलाधिकारी का ध्यान आकृष्ट कराते हुए न्याय की मांग किये है। दरअसल मड़ियाहूं नगर मे कुछ लोग ऐसे हैं जो दिमाग से सिर्फ जमीन के चक्कर मे रहते है।उलट फेर का काम करते हैं। किसी को कब्जा दिलाना, किसी का कब्जा करना है। परिवार मे किसी को तोड़ना, उसके जमीन को येन-केन प्रकारेण सस्ते दाम में बैनामा करना, महंगे दामों में बेचना। ऐसा कृत्य नगर मे चल रहा है ।कहानी एक शमीम पत्रकार की ही नहीं है,न जाने कितने असहाय,गरीब लाचार अपने जमीन से हाथ धो लिये होंगे,यह जान पाना थोड़ा मुश्किल है। शमीम के बारे में नगर के अधिकांश लोग मानते हैं। अन्याय हुआ है। लेकिन आज के दौर मे अगर पारिवारिक मामला है तो लोग वैसे तो बोलेंगे, कहेंगे, लेकिन खुलकर सच्चाई का साथ नहीं देते। क्योंकि ऐसा एक सामाजिक दस्तूर बन गया है। वैसे तो नगर के माननीय जनों, प्रबुद्ध समाजसेवियों को चाहिए शमीम पत्रकार को न्याय दिलाने मे मदद करें। परिवारी जनों,सगे संबंधियों को भी मानवता और इंसानियत के नाते लोग पराये लोगों का मदद करते हैं। शमीम तो आपका अपना है। उसका जो हक बनता है।उसको देना चाहिए। आपके परिवार का आपका भाई, छोटे, छोटे बच्चे बहूं, बेटी दर,दर भटक रहे हो,उनका माली हालत ठीक न हो। रहने के लिए घर न हो, किराये पर दयनीय हाल में जीवन यापन कर रहे हो तो चिन्ता आपको होनी चाहिए। दिल मे रहम का भाव आना चाहिए।
Home / सुर्खियां / समाजसेवी पत्रकार शमीम अहमद मड़ियाहूं की दर्द भरी कहानी,घर से बेघर,अपनों ने दर,दर भटकने के लिए किया मजबूर,जौनपुर डीएम साहब आपका ध्यान आकृष्ट हो,कृपा करिये