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विश्व में शांति की मां भगवती दुर्गा से है कामना,सबका कल्याण हो, चैत्र नवरात्र पर्व में मातृत्व शक्ति की है जागृति, श्री मातृ छाया

जौनपुर। श्री मातृ छाया चैरिटेबल ट्रस्ट मड़ियाहूं के अध्यक्ष साहब दूबे ने कहां कि चैत्र नवरात्र पर्व में मातृत्व शक्ति की जागृति है। वातावरण में जय माता दी की जयकार है। भजन है। सिमरन हैं। आरती है। व्रत है। उपवास हैं। अध्याय है, स्वाध्याय है। समाधि‌ में माइ का दीदार है। जिसमें ओज है,तेज है। प्रताप है। ध्यान है। ज्ञान है। विज्ञान है। मां से संसार है। जिसमें चेतना का असीम भण्डार‌ है। मनुष्य ‘नारी’ शक्ति की वजह से अजेय है और अजेय रहेगा,
एक बार एक प्रसंग भगवान राम के समक्ष आया था। मेघनाथ ने इतना भयंकर युद्ध किया कि रीछ और बन्दरों की सेना व्यथित और व्याकुल हो उठी। राम ने विभीषण से मन्त्रणा की। विभीषण ने बताया- भगवन्! मेघनाथ अपनी पतिव्रता और साध्वी पत्नी सुलोचना की शक्ति के कारण अजेय है। जब तक उसे वह शक्ति मिलती रहेगी तब तक मेघनाथ कदापि जीता नहीं जा सकता?
ऐसे और भी सैकड़ों अलंकारपूर्ण पौराणिक कथानक हैं, उन सब का रहस्य यही है कि मातृ-शक्ति से बढ़ कर मनुष्य के पास दूसरी शक्ति नहीं है। नारी का स्नेह, नारी का समर्पण, नारी का वात्सल्य, नारी का सौहार्द, नारी का विश्वास, नारी की सेवा- ऐसी शक्तियाँ हैं, जिन्हें पाकर मनुष्य अमोघ और अक्षय शक्ति वाला बन जाता है। जिसकी पीठ पर माँ का, स्त्री का हाथ होता है वह अविजित ही संसार में सफलता प्राप्त करता है और आगे बढ़ता है।
किसी भी समाज का साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक स्तर समाज में नारियों की स्थिति में निर्धारित होता है। इतिहास, पुराण के व्यापक परिप्रेक्ष्य देखने से पता चलता है कि नारी के अंतस् की मातृत्व निर्माण एवं नेतृत्व की शक्तियाँ ही पुरुष का शारीरिक, मानसिक, भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास करती रही हैं, मनुष्य को जीवन-पथ पर आगे बढ़ाती रही हैं।
स्त्री शाँति स्वरूपा और पूजनीया है, वह परिवार की शोभा है, देवी है, ज्योति है। उसकी ज्योति से सम्पूर्ण परिवार प्रकाशित होता रहता है, उसके अभाव में घर सुनसान लगता है।प्राणि मात्र के दुःख दर्द को समझने, स्वार्थ को परमार्थ में ढालने की विराट् चिन्तन वृत्ति पुरुष को नारी ने ही दी है।
राष्ट्र का यश,सौभाग्य और लक्ष्मी भी वही है। जिस देश और जाति में नारी का पूज्य स्थान होता है वही देश और जातियाँ गौरव प्राप्त करती हैं, सिर ऊँचा उठा कर स्वाभिमान के साथ अमर रहती हैं।
माँ का स्नेह और वात्सल्य इतनी बड़ी शक्ति है कि वह परमात्मा भी नहीं दे सकता। भारत में परमेश्वर की पिता के समान ही नहीं, किन्तु माता के समान पूजा होती है। माता का शब्द यहाँ सबसे प्यारा और सबसे समीप का सम्बन्ध माना गया है। कोई कष्ट होता है, बड़ा दुःख सिर पर आता है, तब उस समय हम परमात्मा की भी उतनी याद नहीं करते जितना हृदय तल से, माँ की याद करते हैं। हमें उस समय मालूम होता है कि मां से बढ़ कर संवेदनशील, करुणामय, दयार्द्रचित्त और सहायक और दूसरा कोई नहीं हो सकता। ऐसी शक्ति तो सचमुच सम्माननीय ही नहीं पूजनीय है।
“समाज में नारी एक बहुत बड़ी शक्ति है। घर का सारा व्यवहार उन्हीं के हाथ में आज तक रहा, आगे भी रहेगा।
भारत देश में भगवती दुर्गा की विशेष महिमा हैं। दुर्गा शक्ति की प्रतीक हैं। नारी में शक्ति की इतनी सुन्दर कल्पना अन्यत्र कहीं नहीं हुई। उसमें भी पुरुषों के सदृश चैतन्य-तत्व भरा पड़ा है, उसे जगाने की आवश्यकता है।
मानवी शक्ति का जागरण ही विश्व परिवर्तन का आधार है। नारी विधेयात्मक शक्ति है। जो काम पुरुष शक्ति-ताँडव द्वारा करता है, नारी उसे सहज स्नेह, सरलता और सौम्यतापूर्वक सम्पन्न कर लेती है। युग परिवर्तन का महत्वपूर्ण प्रयोजन पूर्ण करने के लिए सर्वतोभावेन-उसी को जगाना चाहिए। उसी को बढ़ाना चाहिए और विश्व-शाँति के उपयुक्त वातावरण बनाने की उसी से याचना करनी चाहिए। नारी-तत्व को प्रतिष्ठित पूजित किए बिना हमारा उद्धार नहीं हो सकता। जेडी सिंह

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