तरुणमित्र के सम्पादक कैलाशनाथ की जीवन झांकी,आदर्श जी गुरु
कहानी सुन्दर होती है, आकर्षण होती है, आरम्भ करने पर छोड़ने का मन नहीं करता, पर जो कहानी मैं लिख रहा हूँ उसमें सम्भवत: वह सब न मिले जो आप चाहते हैं। यह कहानी रेखाचित्र है बड़ी दिलचस्प कहानी कैलाशनाथ की। नाम अनजान नहीं है और नये सिरे से किसी परिचय के मोहताज नहीं है। सादा जीवन, व्यवहार में सरलता, वाणी में मधुरता, जीवन में कर्मठता, सदा मुस्कराता मन भावन चेहरा तंरुणमित्र के सम्पादक एवं संस्थापक कैलाशनाथ जी का।
शारदीय अष्टमी, रविवार 8 अक्टूबर 1978 को हिन्दी दैनिक समाचार पत्र तरुणमित्र का जन्म के समय तरुण मुद्रणालय का भी उदय किया। अखबार का मूल्य 10 पैसा। अपने आवासीय मकान में कार्यालय प्रिंटिंग मशीन, समिति कर्मचारियों से प्रेस का कार्य शुरू हुआ। तरुणमित्र सुगन्धित पृष्प को जन-जन तक पहुंचाने के लिए प्रकाशन की योजना प्रारम्भ की, किन्तु महंगाई के भयंकर दानव ने सदा इस योजना को नोचा-खरोचा तथा दबोचा व साधनहीन स्थितियों से निराश नहीं हुए। आज देश में सुन्दर, रंगीन, आकर्षण ढंग में तरुणमित्र प्रकाशित हो रहा हैं। देश में अनेकों नगरों, महानगरों में शाखाएं हैं और जौनपुर, फैजाबाद, लखनऊ, पटना एवं थाणे ( महाराष्ट्र) मध्यप्रदेश व उत्तराखण्ड से प्रकाशित हो रहा है। बाद में एक उर्दू का अखबार जवांदोस्त भी निकाला। आज भी निकलता है। 3 जुलाई सन् 1937 को स्वर्गीय ठाकुर दास विश्वकर्मा के यहां पैदा हुए पिता (अहियापुर) धरनीधरपुर मोहल्य जिला जौनपुर के निवासी थे। पिता जी कृषि कार्यों के लिए ही दिनभर धौकनी चलाया, फूंका लोहारी व्यवसाय किया। तीन वर्ष बाद भाई विजय पैदा हुए तभी पिता का वरदहस्त से वंचित होना पड़ा। पिता के मृत्यु के बाद फिर परवरिश मां रामदेई ने किया।
माँ ने दाल दराई का काम किया। माँ विपत्तियों में भी मुस्कराते हुए न्याय और आत्म गौरव की रक्षा के लिए सुखों को तिलांजलि देने को शिक्षा दी। ठीक से बोलना भी नहीं सीखा था कि 3 वर्ष की अवस्था में यशोदा देवी से शादी हो गयी। सौभाग्य से इन्हें बड़ी सेवाब्रती, धर्मनिष्ठ और कर्तत्य परायण पत्नी मिली। जब से होश संभाला तभी से संकटों के साये में झूले झूलना इन्हें अच्छा लगा। इनके पास भौतिक दृष्टि से कोई सम्पदा नहीं थी, पर माता-पिता की स्मृति और विरासत में चार बिस्सा जमीन पैतृक घर को अपने को निर्बल नहीं समझा। चिन्तन मनन कर्म की पूंजी है। एक तरफ उत्साह उमंग बेजोड़ है। बमुश्किल तमाम आठवीं कौ परीक्षा दी। हाईस्कू ल प्राइवेट कुंजी पढ़-पढ़ पास किया व इण्टर फेल होने का स्वाद चखा।
आखिरी पेपर के बाद ही डाइंग बाक्स लेकर स्वतंत्रता सेनानी एवं आर्य समाजी ठा0 गजराज सिंह के रिजवी खां स्थित कल्याण प्रेस के सामने नौकरी मांगने पहुंच गये। यहां पर साप्ताहिक पत्र प्रकाश छपता था। कर्मचारियों ने पूछ, ” क्या चाहिए लड़के”, मेरा जवाब काम। “झाड़ पोछा करोगे, बोड़ी पान व
सामान लाओगे” , मेरा जवाब “जी”। “ठीक है कल से आना, चलो आज से ही शुरू करो “। पन्द्रह रूपये में तय हुआ। प्रथम दिन से ही कम्पोजिंग सीख ली। सभी दंग रह गये! कुछ दिन से इलाहाबाद से आने वाले समाचार पत्र लीडर, भारत अमृत बाजार पत्रिका वितरण करने वाला हाकर नहीं आ रहा था। एक पखवारे में यह काम भी ले लिया। हां इसके पहले कुछ पते जरूर पूछे गये। सुबह अखबार बांटना और देर रात प्रेस में काम करना। वेतन 30 रूपया हो गया।
दो साल बाद स्वर्गीय दिनेश सिंह (दम्पू जी) ने आफर दिया। फिर उनके सेवा प्रेस से जुड़ गये। जहां साप्ताहिक पत्र समय निकलता था। बाद में राजा यादवेन्द दत्त दूबे ने चुनाव प्रचार के तहत पार्टी का अखबार निकालने को योजना बनी। संघ से जुड़े होने के कारण बुलाया गया। पांच हजार देकर बनारस भेजा प्रिंटिंग मशीन लाने। यह मशीन स्वर्गीय सावित्री निगम की मिल्कियत में संघ आश्रम के बगल में चली।
इसके बाद आर्य समाज मंदिर में चलो गयी और मन मुयव भी हो गया, फिर छुट्टी ले ली। बाटा में जूता बेचने की नौकरी शुरू कर दिया, तीन साल तक यही किया। इसी दौरान दो हजार रूपया ऋण उद्योग विभाग से लिया। टाउनहाल के पीछे अपना प्रेस खोला। नाम रखा विजय प्रिंटिंग प्रेस। जन्मजात
लेखक होने के साथ-साथ कुशल प्रभावशाली वक्ता के गुण होने के कारण गांडीव अख़बार, जो वाराणसी से निकलता है, के द्वारा जिला संवाददाता भी बनाये गये तथा रात को अध्यापन का कार्य भी किया। एक दिन एक खबर सीधे वाराणसी से छप गयी तो खफा होकर गांडीव की चाकरी भी छोड़ दी। अपना अखबार निकाला नाम रखा तरुणमित्र। धन का अभाव था, संकटो का दौर था, अपनी अकल लगायी। कोर्ट का नोटिस-सम्मन लेने में ‘पेशकार की सलाह पर जिला जज माननीय पवित्र नारायण दूबे को एक सुन्दर पेपरवेट भेंट किया और प्यार मे पीठ थपथपा कर दूबे जी ने आदेश कर दिया। यह तरुणमित्र के लिए प्राणदान था। कुरान पर अपनी टिप्पणी पर गिरफ्तारी हुई, जेल ‘गये। आपातकाल में पूरे 31 दिन जेल में गुजारेथे।
आज सब कुछ है।परिश्रम का नतीजा सटोक और फलदायक निकला। आज खुद का अखबार है, एक नहीं दो-दो। एक हिन्दी का तो दूसरा उर्दू का। चार बेटियां ऋ्रमश: पुष्पा, उषा, निर्मला, मोनिका और दो पुत्र क्रमश: योगेन्द्र व आदर्श हैं। बेटियों व पुत्रों की शादी कर दी। बेटों को सम्पादक बनाया है। अतीत में नौकरी करने निकले थे आज खुद बांटते है। पैदाइश छोड़कर जो ऊचाइयां मिली बमुश्किल तमाम संकटों का दौर था। एक दौर था रमाशंकर लाल, रामेश्वर प्रसाद सिंह, चन्द्रेश मिश्र, बाबू पुरषोत्तम सिंह आदि पत्रकारों से खूब पटती थी। भारतीय विद्या मंदिर की स्थापना खासनपुर में कर दी। इष्टर कालेज महराजगंज में अध्यक्ष पद पर बने रहे। व्यक्तित्व निराला है, धुन के धनी ऐसे हैं कि एक बार जो ठान लेते उसमें पूर्ण रूप से जुट जाते हैं। जिस किसी भी आयोजन को हाथ में लेते है उसे
‘तेजस्विता और ओजस्विता प्रदान करके प्राणादान बना देते। सही में अपने आप में एक संस्था हैं।
सोचो साथ क्या जायेगा का नारा दिया और 1995 में असहाय सहायता समिति का गठन किया यह
संस्था लावारिश लाशों का अन्तिम संस्कार से लेकर असहायों की मदद करने का कार्य करती है। श्री कैलाशनाथ अपने जीवनकाल में कभी हार नहीं मानी यही कारण था कि पूरे जिले सहित प्रदेश में भी उन्हें जानने और मानने वालों कौ कोई कमी नही है। जीवन के अन्त तक न रुकने वाले इस कठिन तप के मार्ग पर वह बढ़ते ही जा रहे थे अग्नि रुपी इस ताप में बनी राष्ट्र को अनूठी चमक से आभासित कर रहे थे दिन रात स्वम् को जला कर मुस्कुराते हुए काम करने की उनकी भावना को देखकर मस्तक स्वंय ही उनको चरणों में झुक जाता है। 2 मई 2021 दिन रविवार को सांय काल 5 बजे अनका निधन हो गया। कोरोना काल होने के नाते उनका शव जिला चिकित्सालय से सीधे स्थानीय रामघाट पर लाया गया और आर्यसमाज विधि से उनका अन्तिम संस्कार कर दिया गया, जेप्ठय पुत्र योगेन्र विश्वकर्मा ने मुखाग्नि दी इसी के साथ एक युग का अन्त हो गया। आज इनके नाम के पूर्व ‘स्वर्गीय’ शब्द लगाते हुए बड़ा अटपटा सा लगता है विचित्र-सा और अविश्वसनीय-सा लगता है पर यह एक सत्य है। मर्म बेधक हृदय विदारक शोक प्रद बज़पात-सा आखों से आंसू दूलक पड़े कि दैव ने छिन-भिन कर छीन लिया था। अब इस नश्वर जगत में नही है परन्तु उनकी आवाज हम सभी के कानों में गूंज रही है और चिरकाल तक गूंजती रहेगी। कैलाशनाथ ऐसी महान विभूतियों में से एक थे जिनकी पुष्य स्मृति पर शरीर में प्राण फूक नई चेतना का संचार करती हुई नव स्फूर्ति और नई दिशा प्रदान करती है। उनकी यादों के मधुर लम्हें उनका सतत साधना पूर्ण एवं तपस्या युक्त जीवन न भूलने वाली दास्तान बना रहेगा।